आपसे एक बात कहनी है

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फेसबुक और ट्वीटर को लेकर काफी आलोचना हो रही है। लेखों को पहुंचने से रोकने से लेकर ग़ायब करने की ख़बरें पढ़ने के बाद मैंने सोचा कि एक नया प्रयास करते हैं। वैसे भी मेरे जैेस पत्रकार और लेखक को छपने से रोकने के लिए कई स्तर पर प्रयास किए जाते हैं। हिन्दी के ही अख़बारों ने मुझे छापना बंद कर दिया है। चंद अपवाद को छोड़ दें तो मेरे लिए वो दुनिया पूरी तरह से बंद हो चुकी है जहां लिख कर मैं आप तक पहुंच सकूं। फेसबुक पर मेरा पेज है @RavishkaPage जहां मैं लिखता हूं। लिखने के लिए काफी वक्त और मेहनत लगती है। वहां से मेरे लेख लेकर कई वेबसाइट छाप लेते हैं मगर कभी एक पैसा तक नहीं देते। ज़रूरी है कि एक लेखक और एक पत्रकार की मेहनत का मेहनाता मिले। इसका संबंध आजीविका से नहीं है बल्कि पाठक और लेखक के बीच सम्मान से है। मैं कुछ लेख के लिए काफी मेहनत करता हूं। कई दिन तक किताबें पढ़ता हूं। रिसर्च करता हूं। वैसे लेखों को अब मैं यहां डालूंगा। RAVISH KA BLOG शुरू करने के पीछे सिर्फ यही सवाल था कि मेरे जैसे पत्रकारों से लोग लिखवाना छोड़ दें, छापना बंद कर दें तब क्या मुझे मान लेना चाहिए कि मेरे लिए दुनिया का अंत हो चुका है ? मैं इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं हूं। मुझे यकीन है कि दुनिया भी रहेगी और आप जैसे पाठक और दर्शक भी रहेंगे। मेरे जैसे पत्रकार भी रहेंगे। सब कुछ मुख्यधारा के चैनल या अखबार नहीं तय करेंगे। जो सरकार के सामने अपना स्वाभिमान नहीं बचा पाए वो दूसरे की संभावनाओं को क्या ही ख़त्म कर पाएंगे।

आपमें से कइयों को पता है कि मैंने बीच में एक पोडकास्ट भी शुरू किया था जिसका नाम है रेडियो रवीश। अब इसे फिर से शुरू करने की सोच रहा हूं। मेरे पास समय कम होता इसलिए कभी-कभार ही कर पाऊंगा। हिन्दी के अलावा भोजपुरी में भी वीडियो बनाने की सोच रहा हूं। भोजपुरी मेरी मातृभाषा है। मुझे लगता है कि भोजपुरी के पाठकों तक अच्छी सामग्री पहुंचनी चाहिए। तो अपने ही रिसर्च को भोजपुरी में भी पेश करूंगा। काश मुझे अंग्रेज़ी आती। मगर गूगल ट्रांसलेशन की सहायता से मेरे लेख अंग्रेज़ी में यहां मिल जाएंगे। गूगल ट्रांसलेशन को जांचने की क्षमता नहीं है, अगर आप अंग्रेज़ी के पाठक हैं तो इसका ध्यान रखेंगे।

यहां पर जो कटेंट होगा वह फ्री नहीं होगा। कम लेख होंगे मगर तैयारी के साथ लिखे जाएंगे। मैं उम्मीद करता हूं कि आप पाठक सपोर्ट करेंगे।आपके भरोसे बड़े अख़बारों और वेबसाइट को जवाब भी देना है जो किसी के लेख को छपने से रोकते हैं और छापते भी हैं तो मेहनताना नहीं देते हैं। यह एक नई व्यवस्था है। जो पाठक और लेखक के सीधे संबंधों के आधार पर विकसित होगी। लिखने-पढ़ने वालों की दुनिया में स्वाभिमान की जगह बची रहे। यह तभी सफ़ल होगा, जब लिखने वाला भी बदले और पाठक भी। आशा है कि मेरी इस कोशिश के पीछे की भावना को आप समझेंगे और सपोर्ट करेंगे। सपोर्ट के तरीके क्या होंगे, उसके बारे में जल्दी ही अपडेट करूंगा। कुछ दिनों तक मैं इस पर भी फ्री लिखूंगा लेकिन कुछ दिनों के बाद यहां के कटेंट फ्री नहीं होंगे।

रवीश कुमार।


Translation :

There is a lot of criticism about Facebook and Twitter. After reading articles about the limiting reach of content, I thought I would try a new one. Anyway, many attempts are made to stop journalists and writers like me from being printed. Hindi newspapers have stopped printing me. Barring a few exceptions, the world is completely closed for me where I can reach you by writing. My page on Facebook is @RavishkaPage where I write. It takes a lot of time and effort to write. From there, many websites take my articles and print them, but never pay even a single penny. It is important that you get the hard work of a writer and a journalist. It is not related to livelihood but to respect, between reader and writer. I work hard for some of these articles. I read books for many days. I do research. Well, now I will put the articles here. The only question behind starting RAVISH KA BLOG was that if journalists like me are no longer asked to write, are stopped from being printing, then should I accept that the world is over for me? I'm not going to give up so easily. I am sure that the world will remain and also readers and viewers like you. Journalists like me will also remain. Everything will not be decided by mainstream channels or newspapers. Those who could not save their self-respect in front of the government will not be able to eliminate the possibilities of others.

Many of you know that I also started a podcast in the middle called Radio Ravish. Now I am thinking of starting it again. I will have less time, so I will be able to do so only occasionally. Apart from Hindi, I am thinking of making videos in Bhojpuri as well. Bhojpuri is my mother tongue. I think good content should reach Bhojpuri readers. So I will present my own research in Bhojpuri also. I wish I knew english, but with the help of Google translation, my articles will be found here in English. Google does not have the ability to cross-check the translation, so if you are an English reader, please keep this in mind.

The content here will not be free. There will be fewer articles here but will be written with a lot of preparation. I hope that you readers will support. On your trust we have to answer Big newspapers and websites that prevent anyone from printing articles and even if they print, they do not pay any money. This is a new system, which will develop based on the direct relationship between the reader and the writer. There was a place of self-respect in the world of writing and reading. It will be successful only when the writer changes as well as the reader. Hope you understand and support the spirit behind this effort. I will share an update about the methods of support soon. For a few days, I will also write on it for free, but after a few days, the content here will not be free.

Ravish Kumar.

[Translated using Google Translate]

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