चलो भाग चलें सिग्नल की ओर…

नया पलायन है। दो एप के बीच का पलायन। लोग व्हाट्स एप से अपना झोला-डंडा उठा कर सिग्नल की तरफ़ भागे जा रहे हैं। ये सभी बेहतर सुरक्षा और निजता की तलाश में भाग रहे हैं।जिसे देखिए वही भाग रहा है। लुंगी कसते हुए तो पतलून खींचते हुए। व्हाट्स एप में कोई मकान तो बनाया नहीं था बस ग्रुप था। सिग्नल में नए ग्रुप बनाने के लिए प्लॉट काटने की ज़रूरत नहीं है। व्हाट्स एप ने अपनी सुरक्षा और निजता की नीति में बदलाव कर दिया है। इसे जो भी समझ रहा है सिग्नल की तरफ़ पलायन करने लग जा रहा है।

टेक्नॉलजी से पलायन की धारणा बदल दी है। यहां माइग्रेशन का मतलब है सुरक्षित और बेहतर विकल्प की तलाश में पलायन। नई सुविधाओं की तलाश में पलायन। इस पलायन में दुख नहीं होता है। घर नहीं उजड़ता है। पहचान नहीं मिटती है। मोबाइल फोन का नंबर एक है। आप एक ऑपरेटर से दूसरे ऑपरेटर में पलायन कर सकते हैं। उसी तरह फोन पर डाउन लोड दो एप के बीच पलायन कर सकते हैं। आप इंसान नहीं हैं। एक डेटा हैं। आपको कोई चुरा लेना चाहता है। आप पहले ही चोरी हो चुके हैं। आप यहां से चोरी नहीं हुए तो क्या हुआ, आप कहीं और से चोरी हो चुके हैं। फिर भाग क्यों रहे हैं?

पलायन अपने साथ स्मृतियों का अंबार लेकर चलता है। टेक्नालजी की दुनिया में होने वाले पलायन की कोई स्मृति नहीं होती है।कोई इनका मकसद ही होता है कि आपकी स्मृतियों को कमज़ोर करना।

गांव से पलायन करने पर शहर आ कर बंदा महीनों रोता है। लेकिन व्हाट्स एप से सिग्नल में पलायन करने वाला पल भर नहीं रोएगा।

पलायन ने स्मृतियों से ख़ुद को अलग कर लिया है। सोचिए जब हमारी स्मृतियां ध्वस्त हो चुकी होंगी तब क्या हमें अपने वतन से दूसरे वतन में पलायन करने पर दर्द होगा। कुछ याद रख पाएंगे?

पलायन करते हुए आप सिर्फ यूज़र होते हैं। नागरिक नहीं होते हैं। निवासी नहीं होते हैं। लंदन में भी लोग व्हाट्स एप से सिग्नल की ओर पलायन कर रहे हैं तो भारत और पाकिस्तान में भी। आप भारत और पाकिस्तान के बीच पलायन नहीं कर सकते लेकिन अपने अपने देश में अपने अपने फोन में व्हाट्स एप से सिग्नल के बीच पलायन कर सकते हैं। नए ऐप में आपसे कोई पासपोर्ट नहीं मांगेगा। वीज़ा नहीं मांगेगा। पिछले ऐप में जो ग्रुप बनाया है वो मकान नहीं है। नए एप में प्लॉट काट कर ग्रुप नहीं बनाना है। बस एक को डिलिट करना है और दूसरे को डाउनलोड।

कभी आप एसएमएस के थे। अब मोबाइल फोन में एसएमएस का बक्सा वीरान पड़ा रहता है। बैंक और मार्केटिंग कंपनियों के मैसेज आते रहते हैं। कोई नहीं देखता है। आप फीचरवादी हैं। सुरक्षित फीचर की तलाश में कब तक भागेंगे। कहां कहां से भागेंगे। बस एक जगह आप भीड़ बनते हैं और दूसरी जगह भीड़ बन कर भाग रहे हैं।

बेहतर है निजती की समझ पैदा कीजिए। इसके सवाल को व्यापक संदर्भ में देखिए। आए दिन स्कीम के नाम पर आपका डेटा दिए जा रहे हैं। आधार कार्ड से लेकर क्रेडिट कार्ड की जानकारी दिए जा रहे हैं।  गूगल मैप से आपके बारे में सब कुछ जाना जा चुका है। इन दिनों सभी टोल पर फास्ट टैग चालू हो गया है। हाइवे पर लड़के फास्ट टैग कार्ड बेच रहे हैं। आधार कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस की तस्वीर ले रहे हैं। वो उसका क्या करेंगे, किसे पता, किसे समझ है कि वे कुछ नहीं करेंगे। सब कुछ जान लिए जाने के बाद अब क्या जानना बाक़ी रह गया है? यही कि आप किससे और क्या बात करते हैं? असली लड़ाई यही है।

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