काश कुणाल कामरा पर औरंगज़ेब की अवमानना का आरोप लगा होता

जब व्यंग्यकार का सर कलम करने का फैसला सुनाने से औरंगज़ेब भी कांप गया

“उसे दंड देने से तुम्हारी पहले से और अधिक तौहीन होगी। हमारा वफ़ादार चाहता है कि मैं उसके अपमान में साझीदार बनूं ताकि निआमत ख़ान मनमानी करने लगे और मेरे बारे में भी लिखे और फिर दुनिया में मशहूर हो जाए। वैसे उसने मुझे भी नहीं छोड़ा है। मैंने तो उसका इनाम बढ़ा दिया था ताकि वह दोबारा न लिखे। इसके बाद भी उसने व्यंग्य करना नहीं छोड़ा।यह मुमकिन नहीं है कि उसकी जीभ काट दी जाए। गला काट दिया जाए। हमें मन मसोस कर यह क़बूल करना ही होगा। वह दोस्त है। न तो तुमसे चिपकता है और न ही तुमसे दूर जाता है।”

यह शब्द औरंगज़ेब के हैं। जिसका हमने अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद किया है और यह किस्सा इतिहासकार अभिषेक काइकर की किताब THE KING AND THE PEOPLE से लिया गया है। वाक़या 1688 या 1689 के साल का है। दिन का पता नहीं। औरंगज़ेब का एक वफ़ादार बादशाह से दरख़्वास्त करता है कि मिर्ज़ा मोहम्मद निआमत ख़ान ने उसकी शादी को लेकर तंज लिखा है। उसकी शादी का मज़ाक उड़ाया है। उसे सज़ा दी जाए ताकि वह दोबारा ऐसा लिखने की ज़ुर्रत न करे। औरंगज़ेब निआमत ख़ान को सज़ा देने से इंकार कर देता है। कुणाल कामरा चाहें तो सुप्रीम कोर्ट में एक व्यंग्यकार को लेकर औरंगज़ेब के इस फ़ैसले का हवाला दे सकते हैं। औरंगज़ेब साफ़ साफ़ कहता है कि तुम्हारा अपमान हुआ है और मैं फैसला देकर तुम्हारे अपमान में साझीदार नहीं होना चाहता। जबकि औरंगज़ेब को पता है कि निआमत ख़ान ने अपने व्यंग्य में उसे भी नहीं छोड़ा है।

अपनी किताब में ऐसे अनेक दस्तावेज़ी किस्सों के सहारे अभिषेक बता रहे हैं कि सत्रहवीं और अठारहवीं सदी की दिल्ली में लोगों के मिज़ाज में तब्दीली आने लगी। वजह इस दौर की स्थिरता के कारण आर्थिक तरक्की का दायरा अमीर-उमरा से निकल कर आम जनता तक फैल जाता है। पैसे के कारण दरबारी और पुराने कुलीन के अलावा नए-नए सेलिब्रिट्री पैदा हो जाते हैं। जिनकी अपनी ठसक होती है। जैसा कि आज कल हम नव-दौलतियों की चाल-ढाल के बारे में कहते हैं। उनके भीतर भी कुछ होने का बोध जागता है। यहां तक कि वे पास से गुज़र रहे बादशाह के काफ़िले और अमीर- उमरा की सवारी को भी अनदेखा कर देते हैं। यहीं से बादशाह और रिआया यानी प्रजा के बीच संबंधों के हाव-भाव बदलने लगते हैं। इसकी शुरूआत शाहजहां के समय से शुरू होती है और औरंगज़ेब के दौर में भी जारी रहती है।

इस समय औरंगज़ेब शाहजहां को जेल में बंद कर देता है। उसे अपनी स्वीकृति चाहिए। जिसके लिए कभी वह दक्कन की तरफ साम्राज्य विस्तार के लिए प्रस्थान करता है तो कभी इस्लामिक आधार पर इंसाफ़ की व्यवस्था बनाता है, यह साबित करने के लिए कि वह अल्लाह का नुमाइंदा है और उसके आदेशों का पालन कर रहा है। लंबे समय तक जंग में रह कर वह प्रजा को अपनी तलवार की ताकत भी दिखाता है और मज़हबी क़ानून के मातहत लाता है।अभिषेक इसे कम्युनिटी ऑफ मुस्लिम कहते हैं जिसे इस्लामिक क़ानून का पाबंद बनाया जाता है। इस प्रक्रिया पर अलग से लिखा जा सकता है लेकिन मैं यहां छोड़ रहा हूं। बस आप यूं समझ सकते हैं कि आज के भारत में धर्म की राजनीति के ज़रिए कम्युनिटी ऑफ हिन्दू बनाने की कोशिश हो रही है। लेकिन उस दौर में भी कम्युनिटी ऑफ मुस्लिम के दायरे के बाहर बहुत से मुस्लिम और हिन्दू शायर हैं जो औरंगज़ेब की आलोचना करते हैं। उसके दौर पर तंज करते हैं। कई बार सामने से तो कई बार इशारे से।

इस्लामी कानूनों को अमल में लाने के लिए बादशाह अपने दरबार में फैसला सुनाने के रिवाज को कम करता है। इंसाफ़ का एक ढांचा खड़ा होने लगता है और मज़हबी आधार पर दिए गए फ़ैसलों का संग्रह किया जाता है जो आगे के फ़ैसले का आधार बनते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में न्यायिक व्यवस्था से जुड़े नए लोग शहर में आ जाते हैं। उन फैसलों की आलोचना भी होती है। तंज भी किया जाता है। एक किस्सा है जिसमें कहा जाता है कि “धर्म योद्धा औरंगज़ेब के समय में तो दुकानदार भी जज बन गए हैं।” यह सुन कर आपको आज के भारत में हाल के दिनों में अदालत की आलोचना की याद आ जाएगी। लेकिन हम तो औरंगज़ेब के दौर की बात कर रहे हैं।

इतिहासकार अभिषेक नियामत ख़ान और मीर जफ़र ज़टल्ली नाम के दो शायरों की रचनाओं का हवाला देते हैं। नियामत ख़ान औरंगज़ेब की शाही रसोई में सुप्रीटेंडेंट था। अधीक्षक। ज़टल्ली भी किसी अमीर की कृपा पर आश्रित था। दोनों की रचानाओं की शैली अलग है लेकिन दोनों ही बेहद बारीक अंदाज़ से औरंगज़ेब के दौर की नौकरशाही पर तंज करने के बहाने औरंगज़ेब पर तंज कर रहे हैं। मैं अगर सारी बातें लिख दूंगा तो आप किताब पढ़ने की मेहनत से बच जाएंगे, जो मैं नहीं चाहता हूं।औरंगज़ेब को भी इन रचनाओं के बारे में पता है जिसके ज़िक्र से हमने इस लेख की शुरूआत की है।

निआमत ख़ान औरंगज़ेब के साथ दक्कन की यात्रा पर भी जाता है। इस फैसले की दिल्ली में भी औरतें आलोचना करती हैं और कहती हैं कि इतनी हरी भरी दिल्ली है लेकिन आलमगीर हमारे पतियों को लेकर चले गए हैं, हम कैसे ज़िंदा रहे? नियामत ख़ान अपनी एक रचना में दक्कन की यात्रा की आलोचना के लिए कुरआन का ही इस्तमाल करते हैं। लिखते हैं कि हमें बताया गया है “अल्लाह मेहरबान है। यहां तक कि औरंगज़ेब के सिपाही घरों से दूर हैं। परिवारों से दूर हैं। बेटा की पैदाइश को लेकर दुखी हैं। रोटी और पानी पीकर जी रहे हैं। मौत के डर के साये में रहते हैं।”

साफ है कि नियामत ऊपर वाले की मेहरबानी पर तंज करते हुए औरंगज़ेब के फैसले पर तंज कर रहे हैं। बता रहे हैं कि ऊपर वाले की इतनी मेहरबानी हुई है कि ज़िंदगी के लिए तरस रहे हैं और मौत के साये में जी रहे हैं। औरंगज़ेब को बड़ा गर्व था कि उसे कुरआन अच्छी तरह पढ़नी आती है और कुरआन की आयतों का हमेशा ज़िक्र करता रहता है लेकिन निआमत ख़ान औरंगज़ेब पर तंज करने के लिए कुरआन की आयतों को अलग तरीके से पढ़ता है ताकि बता सके कि बादशाह को कुरआन की असली समझ नहीं है। यह बड़ा दुस्साहस नहीं है। औरंगज़ेब की जैसी छवि बनाई गई है उसके हिसाब से तो इस तंज पर निआमत ख़ान का सर क़लम कर दिया जाता लेकिन औरंगज़ेब ऐसा नहीं करता है।इन प्रसंगों के ज़रिए इतिहासकार अभिषेक बता रहे हैं कि सत्रहवीं और अठारहवीं सदी के दौर में आम लोग किस तरह बादशाहों की नीतियों और फैसलों पर सवाल उठाने लगे थे। यह एक नया बदलाव था जिसे बख़ूबी दर्ज किया गया है।इस तरह के कई मज़ेदार प्रसंग हैं।

ज़टल्ली की अपनी शैली है। वह इस तरह से लिखता है जैसे बादशाह के दरबार में कोई शिकायत लेकर जाता है और बादशाह की ज़ुबान से वो बात कहलवाते हैं जिससे पता चलता है कि औरंगज़ेब का ही मज़ाक उड़ाता गया है। इसके लिए ज़िल्लत औरंगज़ेब के लिए हिन्दी ज़ुबान का सहारा लेते हैं। एक ऐसे ही प्रसंग में औरंगज़ेब को बताया जाता है कि राजकुमार कम बख़्श के साथ ज़ुल्फिक़ार ख़ान बाग़ी हो गया है लेकिन वह अब बादशाह के लिए कुर्बान होने को तैयार है। तब औरंगज़ेब का जवाब होता है “गधे की दोस्ती और दुम से बैर।” इस एक पंक्ति के ज़रिए ज़ताल्ली बादशाह के दरबार के कानून कायदे का मज़ाक उड़ा देता है जहां माना जाता था कि हर बात कहने का एक सलीका होता है।

एक और किस्सा है। बादशाह के दराबर में अकबराबाद के किला कमांडर की शिकायत की जाती है वह आम लोगों को बहुत परेशान करने के बाद पेंशन वगैरह देता है तो बादशाह हिन्दी में जवाब देते हैं कि “डोम, प्यादा, पुस्ती, तीनों बेईमान।” ऐसा कर ज़टल्ली बताता है कि बादशाह की निगाह में आम लोगों की क्या औकात रह गई है। वह उनकी परेशानी को बेईमान कह कर खारिज कर देता है। जबकि यह बादशाह दंभ भरता रहता है कि अल्लाह का बंदा है और जनता की भलाई के लिए उसके आदेश से हुक्म कर रहा है। लेकिन उस पर निर्भर जनता का यह हाल है और बादशाह उनके बारे में इस तरह से सोचता है।

एक किस्से में महंगाई का ज़िक्र है। ज़टल्ली लिखते हैं कि लोमड़ी, भेड़िया, बिच्छू और सांप को छोड़ कर लौहार में इंसान का नामोनिशान नहीं है। अनाज का दाम जवाहरात के बराबर है। बाग़ीचे जला कर राख कर दिए गए हैं। सड़क के दोनों किनारे की आबादी साफ कर दी गई है। शहर के भीतर कर्बला का रेगिस्तान नज़र आता है। किले की हर ईंट निकाल कर हवा में उछाल दी गई है। आम लोग और अमीर शराब के नशे में धुत्त हैं। नरक में भेज दिए गए हैं। जो नेक लोग हैं वो कब्रों की तरफ भाग गए हैं। लेकिन इन सबके बाद भी बादशाह अपने पुराने दरबारियों की तरफदारी करते हैं। इसके जवाब में बादशाह जो पंक्ति कहते हैं वो इस तरह है- थुकी दाढ़ी, फटी मुंह।

ज़टल्ली बादशाह के लिए जिन जुमलों का इस्तमाल करता है उससे ज़ाहिर है कि एक बेपरवाह शासक है। उसे लोगों की तकलीफ से कोई मतलब नहीं है। शहर ख़ाक हो चुके हैं तब भी वह अपने नौकरशाहों को बचाने में लगा है। एक तरह से आलोचना औरंगज़ेब की ही हो रही है। यह वह दौर था जब नियामत की रचनाओं की कई कापी लोगों के हाथ में पहुंच रही थी। बांटी जा रही थी। उन्हें पढ़ कर लोग अपनी तरफ से व्यंग्य लिखने लगे थे।

यह पुस्तक की समीक्षा नहीं है। लेकिन इस पुस्तक में दिए गए इन प्रसंगों से आज के भारत की समीक्षा हो जाती है। कुणाल कामरा, मुनव्वर फ़ारूक़ी, संजय राजौरा को यह किताब पढ़नी चाहिए। औरंगज़ेब ने तो अपने समय में समझ लिया था कि इन व्यंग्यकारों का सर कलम मत करो, इनकी कलम का सर कलम मत करो,वर्ना दूसरे और पैदा हो जाएंगे। किनता दुखद है कि आज के भारत में कमेडिन को जेल भेजने वाले यह बात नहीं समझ पाते। उन्हें समझाने के लिए औरंगज़ेब का हवाला दिया जा रहा है। औरंगज़ेब होता तो इन्हें इनाम देता। इन्हें जेल भेजा जा रहा है। किताबें पढ़ते रहिए। इतिहास को जेल में बंद मत कीजिए। नए नए किस्सों से इतिहास की समझ नई उड़ान भरती है। मज़ा लीजिए।

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