कितना दिखते हैं विधायक जी, अब कम भी दिखा करें, काम करें काम करते हुए दिखा न करें।

जब दिखना ही सत्य का एकमात्र आधार हो जाए तो दिखने की अति होने लगती है और दिखना दिखावा जान पड़ने लगता है। झूठ लगने लगता है। अगर आप विधायक, सांसद और मंत्री को उनके ट्विटर, फेसबुक और इंस्टा पेज पर जाकर देखें तो उनके दिखने की आदत से विरक्ति हो जाएगी। ये और बात है कि ये सभी दिखाई देने की आसक्ति में डूबे हुए हैं। उठते के साथ ही अपे सोशल मीडिया पेज पर दिखने शुरू हो जाते हैं। अब तो नेता अपना वीडियो भी बनाने लगे हैं और अपलोड करने लगे हैं। ये विधायक काम कब करते हैं यह जानने के लिए आप उनका फोटोग्राफर बन जाइये तब आप जान सकेंगे कि आप उनसे ज़्यादा काम करते हैं। क्योंकि उनके हर काम को काम बता कर फोटो उतारना अपने आप में पहाड़ चढ़ने जैसा काम है।

हमारे सांसदों और विधायकों ने दिखने की कला सीख ली है। प्रतिनिधि ने इन तस्वीरों को अपना प्रतिनिधि बना लिया है। काफी नहीं है कि विधायक जनता का प्रतिनिधि हैं। विधायक को अपना प्रतिनिधि चाहिए। फोटो उसका प्रतिनिधि है। एक जगह वास्तविक है लेकिन बाकी जगहों पर आभासी है। पूरे क्षेत्र में वर्चुअल उपस्थिति को बनाए रखने के लिए विधायक एक जगह उपस्थित होता है। फिर फोटो को अपना प्रतिनिधि बना कर सारी जगहों पर भेज देता है। इसके लिए उस एक तस्वीर को सोशल मीडिया के सारे प्लेटफार्म में अपलोड किया जाता है। वास्तविक जगत में आप एक मोहल्ले में दिख कर दूसरे मोहल्ले में नहीं दिख सकते हैं। लेकिन दिल्ली के कालकाजी मंदिर में दर्शन की तस्वीर के ज़रिए आप इंस्टा से लेकर ट्विटर पर दिख सकते हैं। सोशल मीडिया के इन खातों से विधायक अपने दिखने को मल्टीप्लाई यानी कई गुणा में बदल देता है। विधायक जी अवतारी हो गए हैं।

दिखने की इस प्रक्रिया में कोई विधायक या सांसद कैसे दिखाई देता है इसका अध्ययन करना चाहिए। सदन के भीतर उसकी स्वायत्तता समाप्त हो चुकी है। वह पार्टी व्हीप और अनुशासन और नेता के भय के कारण चुपचाप उपस्थित रहता है। मेज़ पर ताली बजाता है। कभी-कभार सवाल पूछता है। पूछने की औपचारिकता दिखा कर सिस्टम में बने रहता है। सदन की बैठकें कम हो चुकी हैं। कानून बनाने की प्रक्रिया में विधायक या सांसद को कितना रिसर्च करना पड़ता है अब उस काम की कोई ज़रूरत नहीं रही। कहीं से कानून बन कर आता है और विधायक या सांसद को ताली बजा कर स्वागत करना पड़ता है। कितने सांसदों को पता होगा कि कृषि कानून के लिए अध्यादेश आने वाला है। रातों रात आ जाने के बाद सब स्वागत करने लगे हैं। अच्छा बताने लगे हैं। जिस मंच के लिए वह प्रतिनिधि चुना गया है उस मंच पर उसका प्रतिनिधित्व संकुचित हो गया है। शायद उसकी उपस्थिति से ज़्यादा ज़रूरत नहीं रही।

विधायक या सांसद अपना प्रतिनिधित्व इन तस्वीरों के ज़रिए उपस्थित करने लगे हैं। दिखने का दबाव उनके व्यवहार को बदलने लगा है। जहां जा रहे हैं वो जगह दिखने लायक हो इसका दबाव कार्यकर्ताओं और उनके इंतज़ाम पर पड़ने लगा है। मंदिर जा रहा है तो वहां जाने से लेकर सर झुकाने की अलग तरह से तस्वीरें ली जाती हैं। वह जनता का सेवक है। वह ईश्वर का भी सेवक है। इस तरह वह धर्म विशेष के क्षेत्र में प्रतिनिधित्व हासिल करता है। तरह तरह के त्योहारों में अपनी धार्मिकता का प्रदर्शन करता है। त्योहार के आने के महीना भर पहले से होर्डिग के ज़रिए मोहल्ले मोहल्ले में पहुंचा रहता है। अब तो विधायक की तस्वीर देख कर पता चलती है कि होली आ रही है। पंचाग की ज़रूरत ही नहीं रही। लगता है कि उसे धर्म और त्योहारों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुना गया है। आप शायद ही कोई एक तस्वीर किसी विधायक या सांसद की सदन के भीतर की देखेंगे। आप अपने क्षेत्र में सांसद या विधायक के होर्डिंग को ग़ौर से देखिए। क्या कभी आपने विधान सभा या संसद के भीतर-बाहर की तस्वीर उस पर देखी है?

कहने का मतलब है कि जो जनता का प्रतिनिधि है,वो सदन के प्रतिनिधित्व की छवि से ख़ुद को काटता जा रहा है। उसकी नाना-प्रकार की उपस्थितियों में सदन की उपस्थिति बताने लायक भी नहीं रही। उल्लेखनीय नहीं है। क्योंकि सदन के कार्यकलापों में उसकी भूमिका सीमित या समाप्त हो चुकी है। फोटो योग्य नहीं है। एक विधायक के इंस्टा पेज पर डाली गई तमाम तस्वीरों में सदन की तस्वीर खोजता रहा। जगह-जगह नारियल फोड़ने और दर्शन करने की तस्वीरें है मगर सदन में बोलते हुए या सदन के बाहर या सदन से जुड़े किसी काम की कोई तस्वीर नहीं है। क्या विधायक इसलिए चुना जाता है कि वह मंदिर जाए, फोटो खिंचाएं, नारियल फोड़े फोटो खिंचाएं? किसी उम्मीदवार को किसी सदन के सदस्य के लिए चुनते हैं या किसी धर्म के सदस्य के लिए चुनते हैं? फोटो अगर किसी सांसद या विधायक के तमाम कार्यों का प्रतिनिधि है तो उसके विधायी कार्यों का इन फोटो में प्रतिनिधित्व क्यों नहीं है?

जनता जब एक विधायक को या जब एक विधायक जनता को अपने मूल काम से अलग कर देगा तो इससे नुकसान जनता को होगा। वह आपके बीच किसी सदन के प्रतिनिधि के तौर पर नहीं आएगा, किसी धर्म के प्रतिनिधि के तौर पर ही आएगा। लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्थाओं में सदन भी एक है। उसी के सदस्य के रूप में वह लोकतंत्र के कार्यकलापों का संवैधानिक निर्वाहन करता है। अगर वही तमाम छवियों में शामिल नहीं है तो इसका मतलब है कि एक सांसद या विधायक का जनता के बीच जो प्रतिनिधित्व का जाल बिछाया गया है वह लोकतंत्र का फोटो नहीं है। किसी और चीज़ की तस्वीर है।

इंस्टाग्राम पर एक विधायक के धार्मिक स्थल पर जाने की तमाम तस्वीरों को देख रहा था। ऐसा लगा कि विधायक इस बात को लेकर सचेत है कि वह किसी एक धर्मविशेष के प्रतिनिधि के रुप में ही देखा जाए। बहुसंख्यक तीज त्योहारों के वक्त तो मोहल्ले मोहल्ले में जाता हुआ दिखे लेकिन अल्पसंख्यक तीज त्योहारों के समय औपचारिकता दिखा दे या वो भी न करे। उसके क्षेत्र में मजार भी होगी। मस्जिद भी होगी। इन जगहों को तो छोड़िए वह इस बात को लेकर भी सचेत है कि कहीं मुस्लिम समाज से मिलता हुआ न दिखा जाए। ऐसा नहीं है कि वह मिलता नहीं होगा। वह मिलती नहीं होगी। मेरा मानना है कि ज़रूर मुलाकात होती होगी। दौरे होते होंगे। लेकिन उन मुलाकातों की तस्वीर या तो अनुपस्थित है या बहुत कम है। इक्का-दुक्का।

किसी न किसी के क्षेत्र में चर्च भी होता होगा। लेकिन किसी सांसद या विधायक को ईसाई समाज के त्योहारों के वक्त चर्च जाते नहीं देखा। जिस तरह से वह मंदिर जाने को लेकर अपनी तस्वीरों को प्रदर्शित करता है, वह चर्च को लेकर नहीं करता है जबकि साल में एक या दो बार ही इसकी नौबत आती है। आप यह न कहें कि त्योहारों के वक्त मंदिर जाना निजी आस्था का विषय है। आप जानते हैं कि वह जाता इसलिए है ताकि जाता हुआ दिखाई दे। वह आस्था के प्रदर्शन के लिए एक त्योहार के दिन बीस मंदिरों में नहीं जाता है। आप जानते हैं कि इन धार्मिक तस्वीरों के ज़रिए वह राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराता है। तो ऐसी ही दो अन्य तस्वीरों के ज़रिए वह राजनीतिक उपस्थिति दर्ज क्यों नहीं कराता है? सवाल यह है। इस प्रक्रिया में वह अपनी उपस्थिति से जनता के बीच अलगाववाद की रेखाएं खींच रहा होता है। यह समझने की बात है।

जिस तरह से उसकी तमाम तस्वीरों में विधायी कार्यों की तस्वीरें गौण हो गई हैं उसी तरह उसकी तमाम धार्मिक तस्वीरों में कई धर्मों की तस्वीरें गौण हो गई हैं। एक विधायक अपने विधायी कार्यों से विहीन हो कर कई धर्मों के बीच अपनी उपस्थिति से भी विहीन हो रहा है। वह अपनी उपस्थिति को वास्तविक से आभासी बना रहा है। नाटकीय बना रहा है। क्या बहुसंख्यक जनता के लिए किसी विधायक की उपस्थिति की यह एकमात्र शर्त है कि वह जब भी मंदिर जाए ज़रूर बताए। क्या मंदिर जाना या राह चलते किसी मंदिर की तरफ सर झुका कर प्रणाम करना मात्र फोटो अवसर है। बगैर फोटो की ज़रूरत के वह किसी मंदिर की तरफ मुड़ कर प्रणाम नहीं कर सकता है? याद रखिएगा। पहले इसने विधायी कार्यों को नौटंकी में बदला और अब धार्मिक कार्यों को नौटंकी में बदल रहा है।

दिखाई देने की इस राजनीति में न दिखाई देने की राजनीति है। दिखने के नाम पर जो नहीं दिख रहा है उस पर ग़ौर करना चाहिए। रेल मंत्री हर दिन ट्विट करते हैं कि इस जगह से किसानों का धान लेकर किसान रेल उस जगह गई है। यह वह दिखाते हैं। लेकिन उनके इस दिखाने में यह नहीं दिखता है कि इस जगह का धान जब उस जगह गया है तो क्या रेट अधिक मिला है? रेल मंत्री उस जगह पर धान का रेट नहीं बताते हैं? बताना चाहिए ताकि बाकी जगहों के किसान भी किसान रेल से अपना धान वहां भेज कर अधिक रेट हासिल कर सकते? लेकिन रेट का पक्ष गौण है जबकि वह ऐसी तस्वीरें इसी मकसद से ट्विट करते हैं कि किसान एक जगह से दूसरी जगह धान भेज कर अधिक रेट हासिल कर रहा है। यह वाला पक्ष दिखाई नहीं देता है। आप देखना चाहें तो देख सकते हैं कि कैसे आपका देखना बदला जा रहा है। आप क्या देखेंगे इसकी ट्रेनिंग की जा रही है।

प्रधानमंत्री तो कैमरे के बीच में आने वाले सुरक्षाकर्मी को हटा देते हैं। अक्तूबर महीने में प्रधानमंत्री मनाली और लाहौल स्फीति के बीच 9 किमी लंबी सुरंग का उदघाटन करने गए थे। सुरंग में सुरक्षाकर्मियों के अलावा और कौन होगा। लेकिन वे हाथ ऐसे हिला रहे थे कि लाखों की भीड़ दोनों तरफ खड़ी हो। दरअसल वे कैमरे के ज़रिए लाखों लोगों की कल्पना कर रहे थे और हाथ हिला रहे थे। इस तरह वे सामने अनुपस्थित जनता को भी वर्चुअल दुनिया में उपस्थित मान कर अभिवादन कर रहे थे। अब अभिवादन के लिए जनता की उपस्थिति अनिवार्य नहीं है। जैसे सांसद या विधायक होने के लिए सदन में उपस्थिति की तस्वीर अनिवार्य नहीं रह गई और न उपस्थिति।

एक सांसद और विधायक अपने फोटो में जीने लगे हैं। फोटो में उनकी उपस्थिति एक नई राजनीतिक यथार्थ की रचना कर रही है। वह उन कामों का प्रतिनिधित्व कर रहा है जिसके लिए चुना ही नहीं गया है। क्या एक विधायक इसलिए चुना जाता है कि वह दिन भर मंदिर मंदिर जाता रहे। जहां जाए उसका फोटो भेजता रहे। आपको लगेगा कि विधायक पारदर्शी हो रहा है। इससे धोखा होने वाला है। आप उसका आना-जाना तो देख पाते हैं लेकिन आने जाने के मकसद और उस दौरान हुए भीतरी डील का पता नहीं चलता है। वह इन तस्वीरों के ज़रिए अपनी राजनीति को अपलोड कर रहा है। अपनी राजनीति को फोटो में बदल रहा है और फोटो के पीछे कुछ और कर रहा है जिसका फोटो आप नहीं देख पाते हैं। वो दिखता है जब रातों रात एक सरकार कृषि कानूनों का अध्यादेश लेकर आती है और किसानों पर कानून थोप देती है।

मैं इन तस्वीरों को देखते-देखते विधायक और सांसद होने की कल्पना से डरने लगा हूं। क्या चुने जाने के बाद फोटो खिंचाना ही सबसे बड़ा काम हो जाएगा?  जनता के बीच मौजूदगी का यही मतलब हो जाएगा कि आप कहां जा रहे हैं, जाने के रास्ते का फोटो डाले। जहां पहुंच गए हैं, पहुंचने पर फोटो डालें। चार लोगों से मिले हैं उसका फोटो डालें। वहां से लौट रहे हैं, उसका फोटो डालें। शाम तक फोटो ही डालते रहें। क्या फोटो डालना ही विधायक और सांसद का काम रह गया है?

जब दिखना ही एकमात्र सत्य हो जाए तो दिखने की अति झूठ में बदल जाती है। ये तस्वीरें उस विधायक के काम का संपूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं। बल्कि उसकी मौजूदगी का प्रतिनिधित्व करती हैं। उसके काम का नहीं। काम के परिणाम का नहीं। आपने एक विधायक चुना है विधायी कार्य के लिए न कि फोटो उत्पादन के लिए। पता चला कि पांच साल के दौरान उसने पांच अरब फोटो आपकी आंखों में अपलोड कर दिए। आपकी आखें विधायक जी को देखते देखते पथरा गई हैं। इस इंतज़ार में हैं कि काश आज विधायक जी कुछ कम दिखते। न दिखते। कम से कम दिखने से ब्रेक तो दे देते और ख़ुद भी ब्रेक ले लेते हैं। दिखने की अति हो गई है। न दिखने का आरंभ होना चाहिए।

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