लड़खड़ाते कदमों से चल रही अर्थव्यवस्था नशेमन की निगाहों से मत देखिए जनाब

क्या 2021-22 भारत की जीडीपी वाकई 11 प्रतिशत की दर से बढ़ने जा रही है? 2020-21 का आर्थिक सर्वे यही कहता है।अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष IMF ने तो 11.5 प्रतिशत रहने की भविष्यवाणी की है। अगर ऐसा है तो यह खुशी की बात होनी चाहिए। नौकरियां बढ़ेंगी और सैलरी भी तेज़ी से बढ़ेगी। 11 प्रतिशत विकास दर तो बहुत होती है।

अब आप एक सवाल सामने रखिए।दो तिमाही पहले भारत की जीडीपी माइनस 23.9 प्रतिशत थी और पिछली तिमाही में माइनस 7.5 प्रतिशत और अब सीधे डबल डिजिट में जीडीपी की विकास दर चली जाएगी? ऐसा क्या कमाल होने जा रहा है जो पिछले छह साल में नहीं हो सका।

इसे ऐसे समझिए। आपके पास सौ रुपये थे। उसकी कीमत घट कर 80 रुपये हो गई। अब जब इसमें सुधार होगा यानी 80 से 90 होगा तो कोई कह सकता है काफी तेज़ रफ्तार से विकास हुआ है। असली विकास तो तब माना जाएगा जब 100 रुपया 111 रुपया हो जाए। लाइव मिंट ने इसका एक कारण बताया है। जब जीडीपी माइनस 23.9 प्रतिशत हो गई तो उसका आधार भी काफी घट गया। तो नीचे से उठने की विकास दर 11 प्रतिशत होगी। इस वक्त माइनस में है। ज़ीरो से नीचे। ऐसा न समझा जाए कि ज़ीरो से ऊपर की विकास दर 11 प्रतिशत होने जा रही है।

लाइव मिंट में विवेक कॉल ने लिखा है कि पिछली तिमाही में भारत की जीडीपी सिकुड़ कर 134 लाख करोड़ की हो गई थी। अनुमान है कि नए वित्त वर्ष में यह 149.2 लाख करोड़ की होगी। 2019-20 में भारत की जीडीपी 145.7 लाख करोड़ की थी। तो इस साल दो साल पहले की बराबरी करेंगे। एक मतलब यह हुआ है कि दो साल हमने कुछ विकास ही नहीं किया।

दि वायर पर एक कार्यक्रम आता है। THE INTERVIEW इसमें 12 दिसंबर को करण थापर ने भारत सरकार के पूर्व प्रमुख सांख्यिकी अधिकारी प्रणब सेन का इंटरव्यू किया है। इस इंटरव्यू में करण थापर के सवाल और प्रणब सेन के जवाब भारत की चरमराती अर्थव्यवस्था को समझने में मदद करते हैं। बातचीत का मतलब यह निकल कर आता है कि भारत सरकार न तो संकट को देख पा रही है, न समझ पा रही है और न जो इस वक्त किए जाने की ज़रूरत है वो कर पा रही है। अब अगर देरी से सही कदम भी उठाए तो उसका असर बेकार जा सकता है।

प्रणब सेन बता रहे हैं कि उनके जैसे अर्थशास्त्री जो कभी माना करते थे कि भारत की GDP

7 प्रतिशत रहेगी अब मानते हैं कि कई सालों तक 5 प्रतिशत के आस-पास या उससे भी नीचे रहेगी। इसका मतलब यह हुआ कि निवेश कम होगा, उत्पादन कम होगा और लोगों को नौकरियां कम मिलेंगी। जो सैलरी मिल रही है वह भी कम हो जाएगी। फिर इसका असर यह होगा कि लोग कम खरीदेंगे। अपनी बचत से ही काम चलाएंगे और उनकी आर्थिक क्षमता आने वाले दिनों में और भी ख़राब हो जाएगी। भारत की अर्थव्यवस्था एक दुष्चक्र में फंस गई है जहां से निकलना इतना आसान नहीं है। बहुत जल्दी तो बिल्कुल नहीं।

इस कारण बैंकों की हालत ख़राब है। बैंकों ने जितने तरह के लोन दिए हैं उनके वापस आने की रफ्तार बेहद धीमी हो गई है। बैंक जो लोन देते हैं उसके ब्याज से ही उनका काम चलता है। अब अगर लोन लेने वाला कम हो जाएं, और जिन्होंने लिया है उनके लिए लौटाना मुश्किल हो जाएगा तो बैंकों की हालत ख़राब हो जाएगी। भले बैंक NPA को छिपाने रहते लेकिन उनकी हालत तो किसी से नहीं छिपती है।

आज न कल यह स्वीकार करना ही होगा कि बैंकों के कर्ज़ का सारा हिस्सा NPA हो चुका है। बैंकों को बचाने के लिए सरकार को लाखों करोड़ रुपये के पैकेज देने पड़ेंगे।सरकार के पास पैसे नहीं हैं लेकिन जब बैंक दिवालिया होने के कगार पर पहुंच जाएंगे। तब सरकार को आगे आना ही होगा।

बैंकों की हालत ख़राब है। सरकार ने बीस लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज का एलान किया था। यह पैकेज मूल रुप से लोन की शक्ल में था कि सरकार लोन दिलाने में मदद करेगी।

लेकिन लोन लेने वाले नहीं हैं और बैंकों की हालत लोन देने की नहीं है। निवेश कम होने लगा है। पिछले साल अक्तूबर नवंबर में त्योहारों के कारण अर्थव्यवस्था में कुछ रफ्तार दिख गई थी लेकिन उसके बाद लंबे समय तक कोई ऐसे त्योहार नहीं हैं जिनका संबंध जन ख़रीदारी से हो। अब इस समय पता चलेगा कि हमारी अर्थव्यवस्था की हालत कैसी है।

क्योंकि तब निवेश की बात करनी होगी। उसका डेटा तो छिप जाता है सामने आने लगेगा।

निवेश न होने से लोगों की नौकरियां जाने लगेंगी और सैलरी कम होने लगेगी।

आप जानते हैं कि जुलाई से लेकर सितंबर 2020 की तिमाही में भारत की GDP माइनस 7.5 प्रतिशत तक आ गई। यानी उसके पहले की तिमाही अप्रैल से जून के बीच माइनस 23.9 प्रतिशत हो गई थी वहां से ऊपर उठते हुए 7.5 प्रतिशत तक आई है और यह सुधार के लक्षण हैं। तब भी आप देखें कि निर्मला सितारमण जिस वक्त अपना बजट पेश करेंगे उस वक्त भारत की जीडीपी माइनस में होगी। माइनस 7.5 प्रतिशत। इंडियन एक्सप्रेस में उदित मिश्रा ने इन आंकड़ों का एक विश्लेषण किया है।

भारत के सकल घरेलु उत्पाद GDP की दर 2020-21 की दो तिमाहियों में निगेटिव में रही है। मतलब हुआ कि साल के एक हिस्से में जब तालाबंदी थी तब उत्पादन ठप्प सा हो गया। 23 प्रतिशत उत्पादन कम हुआ। उसके बाद की तिमाही में 7.5 प्रतिशत की गिरावट आई।

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की रिसर्च टीम के अनुसार 49 देशों ने जुलाई-सितंबर की GDP की घोषणा की थी। इन देशों में औसत गिरावट 12.4 प्रतिशत थी जबकि भारत में माइनस 7.5 प्रतिशत। इसलिए भारत का प्रदर्शन ख़राब होने के बाद बेहतरी की दिशा में है। इस पर उदित मिश्रा का तर्क है कि जब अप्रैल-जून की तिमाही में इस 49 देशों की औसत GDP माइनस 5.6 प्रतिशत थी तो भारत की  GDP माइनस 23.9 प्रतिशत थी।

लाइव मिंट में विवेक कॉल ने आर्थिक सर्वे का अध्ययन करते हुए लिखा है कि बजट में अनुमान था कि 2020-21 के दौरान सकल कर राजस्व 24.2 लाख करोड़ का होगा लेकिन अप्रैल से नवंबर 2020 के बीच सरकार के सकल कर राजस्व में 12.6 प्रतिशत की कमी आई है। केंद्र के राजस्व का कुछ हिस्सा राज्यों को भी मिलता है। इसमें भी 20.7 प्रतिशत की कमी आई है। मतलब राज्यों को कम पैसे दिए गए हैं। इस दौरान उत्पाद शुल्क(excise duty) का संग्रह काफी बढ़ा है। तभी तो आप अपनी जेब से पेट्रोल और डीज़ल के अधिक दाम दे रहे हैं। जो बता रहा है कि केंद्र सरकार की आर्थिक हालत कितनी खराब है।

मनीकंट्रोल डॉट कॉम में कमोलिका घोष और अरुप रायचौधरी ने भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम का इंटरव्यू किया है। उनका कहना है कि 2021 का साल भारत के निजीकरण के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण साल होगा।लाइव मिंट के विवक कॉल ने लिखा है कि सरकार ने लक्ष्य रखा था कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेच कर 20 जनवरी 2021 तक 2.1 लाख करोड़ जुटाएगी। केवल 15,220 करोड़ ही अर्जित कर पाई है। जो लक्ष्य रखा गया था उसका 7.2 प्रतिशत। इस 15,220 करोड़ का आधा से अधिक पैसा हिन्दुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड और इंडियन रेलवे केटरिंग एंड टूरिज़्म कारपोरेशन लिमिटेड की हिस्सेदारी बेच कर आया है। विवेक कॉल ने लिखा है कि कोविड को इसका कारण बताया गया है जो साल के पहले हिस्से के लिए सही हो सकता है लेकिन जब आप दूसरे हिस्से में शेयर बाज़ार को देखें तो साफ लगता है कि भारत ने इस रूट ने पैसा हासिल करने का मौका गंवा दिया।

आत्मनिर्भर भारत एक नया नारा है। ताकि लगे कि कुछ चमकदार काम हो रहा था। बस ये न लगे कि पहली बार भारत में बनने वाले सामान के उत्पादन और निर्यात पर ज़ोर दिया जा रहा है। भले उसका नाम आत्मनिर्भर भारत नहीं था लेकिन मतलब तो यही था न कि भारत में चीज़ों का उत्पादन हो और निर्यात हो। उसका उपभोग बढ़े। मोदी सरकार के कार्यकाल में  मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर का प्रदर्शन तो तालाबंदी से पहले के कई तिमाहियों में निगेटिव या बहुत कम रहा है। यह वो सेक्टर है जो रोज़गार देने वाला माना जाता है। अब इसके डूब जाने के बाद आप गया का तिलकुट और फिरोज़ाबाद की चूड़ी बेचकर भरपाई नहीं कर सकते। ये सब भी उसी आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा थे जो सरकार को राजस्व देते थे। जब किसी चीज़ की मांग नहीं है तो उसमें यह भी तो है कि लोग उपभोग कम कर रहे हैं।  

मेरा सिर्फ इतना कहना है। लड़खड़ाते कदमों से चल रही अर्थव्यवस्था नशेमन की निगाहों से मत देखिए जनाब। यह मत समझिए कि अर्थव्यवस्था का लड़खड़ाना गुलाबी नशे के कारण है। बल्कि इसलिए है कि अर्थव्यवस्था बीमार है।

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