साइकिल से लोकतंत्र तो नहीं चलता, नेताओं की दुकान चलती है

साइकिल से लोकतंत्र तो नहीं चलता, नेताओं की दुकान चलती है

विद्या कसम पर लोग डाउट नहीं करते हैं, इसलिए विद्या कमस खा कर कहता हूं कि मुझे सचमुच नहीं पता था कि हमारे नेता साइकिल दिवस भी मना सकते हैं, जो साल भर हाइवे और हाइवे के बाद एक्सप्रेस-वे और एक्सप्रेस-वे के बाद सुपर एक्सप्रेस-वे का सपना दिखाते रहते हैं। इनकी योजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन करते रहते हैं। ऐसा नहीं है कि साइकिल का संबंध राजनीति से नहीं है। विपक्ष में रहते हुए तेल की कीमतों के विरोध में साइकिल एक अनिवार्य तत्व है। तब साइकिल साइकिल की महानता के लिए नहीं लाई जाती है, बल्कि यह बताने के लिए लाई जाती है कि तेल इतना महंगा हो गया है कि कार छोड़ कर गई-गुज़री साइकिल चला रहे हैं। इस तरह साइकिल चलाकर पेट्रोल की कीमतों का विरोध पूरा होता है और सत्ता में आने के बाद नेता एक्सप्रेस-वे के उदघाटन में व्यस्त हो जाते हैं।

पिछले साल प्रधानमंत्री का साइकिल दिवस पर कोई ट्विट नहीं मिला, लेकिन इस साल जब विश्व साइकिल दिवस मनाते देखा तो पिछले साल की एक घटना स्मृति-कार्नर से निकल कर सेंटर में आ गई। घटना 16 नवंबर 2021 के दिन घटी थी। जब पूर्ववर्ती संयुक्त प्रांत, अद्यती उत्तर प्रदेश के पूर्वी प्रांत नामक भौगोलिक खंड मे पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन हुआ था। यह बताने के लिए कि एक्सप्रेस-वे विकास की हर गति का द्योतक है, रफाल नामक नवीन आयातित हमलावर विमान को उतार दिया गया। इसकी गर्जना से विकास गूंज उठा। संदेश प्रसारित हुआ कि यह सड़क केवल SUV कारों के लिए नहीं, लड़ाकू विमानों के भी योग्य है। उस दिन का सीधा-प्रसारण टेढ़ा होकर देख रहा था, तब भी भनक तक नहीं लगी कि प्रधानमंत्री मोदी के दिल में साइकिल दिवस के लिए जगह है। कैसे भनक लगती, साइकिल चलाने वाली जनता को गांव-गांव से बसों में लादकर यहां साइकिल नहीं, विमान दिखाने लाया गया था। प्रधानमंत्री जानते होंगे कि जनता सपने में साइकिल नहीं, जहाज़ और कारें देखती है। साइकिल तो बच्चों के सपने में आती है जब बड्डे आता है।अत: प्रधानमंत्री ने एक्सप्रेस-वे की कल्पना से साइकिल को दूर रखा, वैसे ऐसे एक्सप्रेस-वे पर टोल ही इतना लगता है कि साइकिल वाले क्या ही दे पाएंगे और जब टू-व्हीलर की एंट्री बंद होती है तो साइकिल की बात ही मत पूछो, हे साधो। इसलिए गांवों से लाए गई ग्रामीण जनता के सपने में यह बात न आ जाए कि इस सड़क पर उनकी साइकिल जहाज़ बन कर उड़ेगी, उन्हें असली जहाज़ दिखाया गया और साइकिल उनके सपने के बैक-सीट पर चली गई।

प्रधानमंत्री मोदी का प्रसंग इसलिए आ गया क्योंकि आज उन्होंने ट्विटर पर विश्व साइकिल दिवस की शुभकामनाएं दी है और साइकिल चलाते हुए गांधी की तस्वीर साझा कर दी है। लिखा है कि साइकिल चलाते गांधी जी दुनिया को प्रेरित  कर रहे हैं।  तब से सोच रहा हूं कि गांधी जी, प्रेरणाओं के खनिज-भंडार हैं। वे इतनी प्रेरणा देते हैं कि प्रेरणा लेने वाले भी दो-चार प्रेरणाएं तो भूल ही जाते होंगे। जबकि ऐसा नहीं है कि गोलवलकर और सावरकर ने साइकिल नहीं चलाई होगी। चलाई ही होगी।

जिस रफ्तार से दुनिया व्हाट्स एप देख-देख कर अपनी आंखें ख़राब कर रही है, जल्दी ही बिना चश्मे वाली आंखों को ढूंढना असंभव हो जाएगा, तब कोई चश्मा दिवस घोषित होगा और गांधी को भुला चुके लोग एक बार फिर से चश्मा पहनने की प्रेरणा का लोड गांधी पर डाल देंगे। इस तरह ख़ुद को व्हाट्स एप दोष से मुक्त कर लेंगे। और यह भी नोट करें। एक दिन ऐसा भी आएगा जब प्राइम टाइम के एपिसोड को समझने के लिए अक्षय कुमार से इतिहास में डिग्री लेनी पड़ेगी। बाकी आम कैसे खाना है, वो तो रवीश कुमार फ्री में सिखा ही रहा है।

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