विदेश मंत्री भी गृह मंत्री की तरह ताली बजाने वाली भाषा बोलने लगे हैं

विदेश मंत्री की तरह नहीं किसी विधायक की तरह कुछ भी बोल देने जैसा जवाब है एस जयशंकर का

“दुनिया के आत्मनियुक्त सरंक्षक को यह पचाना मुश्किल हो रहा है कि भारत में कोई है जो मंज़ूरी या मान्यता के लिए उनकी तरफ नहीं देखता है। “

यह प्रतिक्रिया विदेश मंत्री एस जयशंकर की है। इंडिया टुडे कान्क्लेव में फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट पर बोल रहे थे। वाक़ई भारत में कोई है जो उनकी तरफ मंज़ूरी या मान्यता के लिए नहीं देखता है और संरक्षक इस बात को पचा नहीं पाते हैं?

एस जयशंकर का बयान सच्चाई से कोसों दूर है और झुंझलाहट के बिल्कुल करीब है। भारत में ही कोई है जो 2014 से  ग्लोबल स्तर पर मान्यता पाने के लिए हर विदेशी दौरे पर ‘लोकल’ लोगों को बुलाकर रैलियां कर रहा था। यहां लोकल का मतलब है वहां रहने वाले ‘कामयाब’ भारतीयों का आयोजन। जो अपनी नागरिकता भी बदल चुके हैं और जो उन देशों में काम कर रहे हैं। 2014 से उनकी मान्यता और मंज़ूरी के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जितना समय, पैसा और प्रोपेगैंडा निेवेश किया है उतना तो भारत के इतिहास में किसी ने नहीं किया होगा। न्यूयार्क के मेडिसन स्क्वायर से लेकर टेक्सस के हाउडी मोदी कार्यक्रम को आप किस तरह से देखेंगे? विदेशी मुल्कों के नेताओं के साथ का हर लम्हा कूटनीतिक ईवेंट में बदल कर आप उन पर हावी नहीं हो रहे थे बल्कि उनसे मंज़ूरी ले रहे थे। यही नहीं उन देशों के अख़बारों और पत्रिकाओं में नरेंद्र मोदी की तारीफ़ को मान्यता के रुप में इस्तमाल किया गया। दूसरी पंक्ति से लेकर गोदी मीडिया के पहली पंक्ति के एंकरों के ज़रिए प्रचार किया गया। दुनिया की रेटिंग एजेंसी में जैसे ही भारत की रैकिंग ठीक होती थी वाहवाही होने लगती थी। जैसे ही रैंकिंग गिरती थी उस पर सन्नाटा पसर जाता था। जयशंकर की इस दलील की काट में अनेक प्रसंग गिनाए जा सकते हैं।

11 जून 2019 की एक ख़बर पाठक पढ़ सकते हैं। लाइव मिंट के अलावा अन्य जगहों पर छपी है। तब ट्रंप ने कहा था कि हर्ले डेविडसन पर पचास प्रतिशत आयात शुल्क अस्वीकार है। ट्रंप ने इस बात को लेकर भारत को फोन किया था। ख़बर तो यही कहती है कि एक फोन में भारत ने आयात शुल्क घटा दिया।ट्रंप के समय अमरीका ने वीज़ा नियमों को सख़्त कर दिया जिससे भारतीय आई टी सेक्टर के लोगों को वहां काम मिलना बंद हो गया। एस जयशंकर बता सकते हैं कि क्या मोदी ने इस बात को लेकर ट्रंप को फोन किया था? अगर किया था तो उसका क्या नतीजा रहा?

कैमरा आपका है। चैनल आपका है। सवाल आपका है। कोई काउंटर सवाल नहीं है। कुछ भी बोल कर निकल जाना है। वैसे ही जैसे विदेश यात्राओं के समय भारतीयों के जमावड़े को हिन्दी चैनलों के ज़रिए दिखाया जा रहा था कि अमरीका मोदी को सुनने आ रहा है। यह अच्छी बात है कि भारत मान्यता के लिए किसी की तरफ नहीं देखता लेकिन यह बात तथ्यों के धरातल पर कही जानी चाहिए। न कि हर बात को रिजेक्ट कर देने के अहंकार के प्रदर्शन के आधार पर।

फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट में तो अमरीका का भी ग्रेड घटा है। 11 अंंक नीचे आया है। इस रिपोर्ट को लेकर अमरीका के विदेश मंत्री टोनी ब्लिनकन से भी पूछा गया। टोनी ब्लिनकन और एस जयशंकर के जवाबों का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए आपको पता चलेगा कि विश्व गुरु बनने वाला भारत दुनिया में खत्म हो रहे लोकतंत्र की बात को नोटिस तक नहीं लेता है। टोनी ब्लिनकन ने रिपोर्ट को खारिज करने की जगह स्वीकार किया कि दुनिया भर में तानाशाही और राष्ट्रवाद बढ़ता जा रहा है। सरकारें कम पारदर्शी हो रही हैं और लोगों का भरोसा कम हो रहा है। आप भारत के विदेश मंत्री का बयान ठीक से सुनिए इस तरह की चिन्ताएं नज़र नहीं आएंगी। क्या दुनिया में तानाशाही नहीं बढ़ रही? क्या दुनिया में लोकतंत्र ख़त्म नहीं हो रहा है? भारत के बगल में ही म्यानमार में सैनिक तानाशाही रक्तपात मचा रही है, भारत ने वहां लोकतंत्र को लेकर क्या बयान दिया है? दिया भी है? क्या ये सब ग्लोबल चिन्ता के विषय नहीं हैं और हैं तो इसमें भारत की कोई भूमिका नहीं है? हाल ही में विदेश सचिव ने कहा था कि अमरीका, आस्ट्रेलिया, जापान और भारत मिलकर म्यानमार में लोकतंत्र की स्थापना करेंगे। जब रोहिंग्या का संकट हुआ था और म्यानमार की सरकार और सेना पर रोहिंग्या के कुचलने के आरोप लग रहे थे तब प्रधानमंत्री मोदी का म्यानमार दौरा हुआ था। उस दौरे में उन्होंने म्यानमार की सेना की चिन्ताओं का साथ दिया, आम लोगों के नरसंहार को लेकर चिन्ता नहीं जताई थी।

फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट में तो यह भी कहा गया है कि अमरीका में भी लोकतंत्र का पतन हुआ। लोकतंत्र कमज़ोर हुआ है। अमरीका के 11 अंक कम हो गए हैं। अब वह फ्रांस और जर्मनी जैेस लोकतांत्रिक देशों की कैटगरी से निकल कर रोमानिया और पनामा की श्रेणी में आ गया है। अमरीका के विदेश मंत्री ने तो यह नहीं कहा कि फ्रीडम हाउस हमें लोकतंत्र का लेक्चर न दें। अमरीका कहां किसी को मान्यता दे रहा है, वह तो ख़ुद मान रहा है कि उसके यहां भी लोकतंत्र का पतन हुआ है। एस जयशंकर बता दें कि अमरीकी विदेश सचिव टोनी ब्लिनकेन के बयान में कहां पर भारत को मान्यता देने का भाव है जिसे भारत खारिज कर रहा है। जो बात है ही नहीं उस बात को लेकर बयान दो और निकल चलो।
इसका मतलब यह नहीं कि ग्लोबल व्यवस्था में लोकतंत्र को लेकर अमरीका की भूमिका पाक साफ है। कई देशों को अमरीका ने तबाह किया है। लेकिन आप सोचिए उसी अमरीका के विदेश सचिव यह भी कह रहे हैं कि हम महंगे सैनिक हस्तक्षेपों या बल पूर्वक तानाशाही सत्ता को बेदखल करने का प्रयास नहीं करेंगे। इसके ज़रिए लोकतंत्र को स्थापित नहीं करेंगे। हमने अतीत में ऐसे तरीके अपनाएं हैं। हमारा इरादा चाहे जितना भी अच्छा रहा हो, वो काम नहीं किया। इससे लोकतंत्र के प्रोत्साहन के प्रयास की छवि बिगड़ गई। अमरीकी लोगों में दुनिया का विश्वास कमज़ोर हुआ। हम यह काम अलग तरीके से करेंगे।
ठीक इस बयान के सामने आप भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर का बयान रखिएगा। लगेगा ही नहीं कि ग्लोबल व्यवस्था में नेतृत्व हासिल करने की चाह रखने वाले एक देश के विदेश मंत्री का बयान है। एस जयशंकर का बयान ऐसा है जैसे कोई विधायक अपने गांव की मीटिंग में बोल रहा हो कि हमने दुनिया को यह दिखा दिया, वह दिखा दिया। एस जयशंकर फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट खारिज करने के साथ दुनिया भर में तानाशाही को लेकर चिन्ता जता सकते थे। बहुत अच्छा है कि भारत ने दुनिया के कई देशों को वैक्सीन की आपूर्ति की लेकिन इस बात का भारत में लोकतंत्र कमज़ोर हो रहा है से क्या संबंध है? क्या अमरीका और दूसरे देश बाकी देशों में लाखों डॉलर की मदद नहीं भेजते हैं?

अमरीका में रिपब्लिकन पार्टी ने चुनाव की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। ट्रंप लगातार खारिज करते रहे। मगर उनकी ही पार्टी के नेता उनके खिलाफ बोलते भी रहे। जिस नेता को प्रधानमंत्री मोदी अपना दोस्त बताते रहे उस नेता ने वाशिंगटन में हिंसा का नेतृत्व किया। वहां की जनता को चुनाव प्रक्रिया पर विश्वास था। रिपब्लिक पार्टी को विश्वास था और मीडिया को भी। सुप्रीम कोर्ट को भरोसा था।इस बात की आलोचना से आप भारत के चुनाव आयोग की आलोचना को खारिज नहीं कर सकते हैं। जयशंकर को याद होगा कि प्रधानमंत्री के हेलिकाप्टर की जांच करने वाले चुनाव अधिकारी को चुनाव के काम से ही हटा दिया गया था। उसे निलंबित कर दिया।चुनाव आयुक्त अशोक ल्वासा के यहां तो छापे पड़ गए। अशोक ल्वासा ने प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह को चुनावी आचार संहिता के उल्लंघन के मामले में क्लिन चिट देने से इंकार कर दिया था। नतीजा क्या हुआ। चुनाव आयोग के प्रेस कांफ्रेंस की तारीख पहले से सोशल मीडिया पर बीजेपी के नेता लीक कर चुके थे। बिहार के बाद बंगाल में आठ चरणों का चुनाव विवादों में है। यह सब ठोस कारण है चुनाव आयोग पर संदेह करने का और सवाल करने का। आप इस सवालों को अमरीका का उदाहरण देकर खारिज नहीं कर सकते हैं और न अमरीका को लेक्चर दे सकते हैं। सबको पता है मतदान से पहले की रात पैसे और शराब बंटते हैं। इस काम में सभी दल के नेताओं का रिकार्ड अच्छा है।

कम से कम विदेश मंत्री का बयान विधायक जैसा नहीं होना चाहिए। राजस्थान से बीजेपी के विधायक हुआ था करते थे ज्ञान आहूजा। ज्ञान तो ऐसे छलकता था कि अज्ञान जीवनदायनी लगने लगता था।

Show Comments